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  • प्रतिवर्ष माँ विंध्यवासिनी मंदिर में उमड़ता है श्रद्धा का सैलाब

 प्रतिवर्ष माँ विंध्यवासिनी मंदिर में उमड़ता है श्रद्धा का सैलाब


जयद्रथ तंत्र में भी कहा गया है कि भाद्रपद की कृष्ण द्वितीया को मां तारा देवी का जन्म हुआ था। उसी तिथि की रात में देवी जागरण भी किया जाता है परंतु मारकंडेय पुराण में इस पर्व का संबंध मां विंध्यवासिनी देवी के जन्म से माना गया है। स्वामी देव तीर्थ का भी ऐसा विश्वास था। विंध्य माहात्म्य में भी मां विंध्यवासिनी देवी को लक्ष्मी तथा योगमाया का रूप कहा गया है। देवी भागवत में विंध्यवासिनी को सर्वोत्तम सिद्धपीठ कहा गया है। महाभारत में भी कृष्णा रूप वाली देवी का विंध्यवासिनी में होना माना गया है। यह भी कहा जाता है कि विंध्य पर्वत पर कृष्णारूपा देवी के आगमन के बाद से कजली पर्व मनाया जाने लगा। उसी पर्व के उपलक्ष्य में कजली गीत गाया जाने लगा। 
मां कज्जला : मीरजापुर की कजली की ख्याति अंतरराष्ट्रीय स्तर पर है। मान्यता है मां विंध्यवासिनी का जन्म भी कजली की रात ही हुआ था। इसीलिए मां को कज्जला देवी भी कहा जाता है। इस रात देवी जागरण होता है। गांव हो या शहर लोग पूरी रात जगकर कजली गीत गाते हैं और मां की जयंती मनाते हैं। पूरी रात मां विंध्यवासिनी मंदिर में देवी जागरण कार्यक्रम होता। मंदिर को आकर्षक झालरों से सजाया जाता है। कजली से लेकर तीज तक प्रतिदिन देवी जागरण होता है। मां विंध्यवासिनी देवी मंदिर में देश भर से कलाकार आते हैं जो अपनी स्वर लहरियों से लोगों को झूमने को मजबूर कर देते हैं। 
स्वामी देव तीर्थ ने अपनी श्याम रंग कजली मेें बहुत ही सुंदर वर्णन किया है। 
'कजारि ऐसानि देवी कजिरया हो ना।
कुंडल झलकै लाल नजरिया हो ना। 
भादों बदी दुहज के गोकुल आई हो ना। 
छट्ठी निशि विंध्याचल पर छाई हो ना। 
विंध्य क्षेत्र में कजली : मां विंध्यवासिनी देवी को कजली गीत अति प्रिय है। कजली उनके नाम से जुड़ा है। मां विंध्यवासिनी मंदिर के पुजारी राजन पाठक बताते हैं कि कजली गीत मां के नाम से जुड़ा है। मीरजापुर में कजली विंध्य क्षेत्र में ही मनाई जाती थी। कजली की रात बड़ी संख्या में लोग मां विंध्यवासिनी देवी का दर्शन पूजन करने आते हैं।